कहीं  ममता  की लुटिया , टोलेबाज़ ना डुबो दें

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सुधीर कुमार

तमाम सर्वे ममता की वापसी की बात कर रहे हैं , आखिर क्यों न करे ? पश्चिम बंगाल  में ८९ सीटें ऐसी  है, जहाँ मुस्लिम मतदातााओं  की संख्या तीस प्रतिशत से अधिक है , इनमे से छत्तीस ऐसी सीट है  , जहाँ मुस्लिम आबादी पचास प्रतिशत के आसपास है।  पिछले चाहे लोकसभा का  चुनाव हो या विधान सभा का  इनमें से सत्तर सीटों पर ममता ने परचम लहराया था  , तो साफ ज़ाहिर है , कि दो सौ चौरानवे सदस्यों वाली विधानसभा में चुनाव की शुरुआत  ममता सत्तर सीटों के साथ करती , लेकिन फुरफुरा शरीफ के मौलाना पीरज़ादा के कांग्रेस और  लेफ्ट में शामिल होने के बाद  अब ये समीकरण बदल गया है , क्योंकि पीरज़ादा हुगली, मुर्शिदाबाद  और चौबीस परगणा  की  दो दर्जन  ऐसी सीट की मांग कर  रहे है , जिसपर वर्तमान में टीएमसी का कब्ज़ा है , यदि वहां पीरज़ादा की पार्टी चुनाव लड़ती है तो ४२ सीटों पर बीजेपी टक्कर में आ जाएगी।

अगर हम २०१९ में हुए लोकसभा को आधार मान, विधानसभा की सीटों की बात करे, तो उसमे १६४ सीटों पर टीएमसी , १२१ सीटों पर बीजेपी , नौ पर कांग्रेस को बढ़त थी , जबकि लेफ्ट फ्रंट का खाता भी नहीं खुला था।

विधानसभा के क्या होंगे परिणाम ?

वर्तमान में बीजेपी १४१ सीटों पर बेहद मजबूत स्थिति में  है, वहीँ  १२१ सीटों पर ममता की विजय निश्चित है , जबकि २० सीटों पर कड़ा मुकाबला है। तीसरा फ्रंट १५ से २० सीटों पर मजबूत स्थिति में हैं।

आखिर ममता क्यों पिछड़ रही है ?

दरअसल बंगाल के चुनाव में टोलेबाज़ों की बड़ी भूमिका होती है , इनका सीधा संबंध दलों के बड़े नेताओं से होते है , इनके इशारों  पर ही मत डाले जाते है , लेफ्ट के शासन काल में दिन प्रतिदिन इनकी गुंडई बढ़ती गई , नतीजा लेफ्ट का पतन।  यही हाल वर्तमान में ममता के टोलेबाज़ों का है , जमीन पर कब्ज़ा करना , छोटे छोटे दुकानदारों से चंदा लेना , ना देने पर गलत मामले में फंसा देना या फिर जान ले लेना , यही वजह है की , पिछले लोकसभा चुनाव में पचास प्रतिशत बूथों पर विपक्षी दलों के एजेंट भी न थे , इसके बाद भी लोकसभा चुनाव में ममता की करारी हार हुई थी। जो दर्शाता है ममता भलेही मुख्यमंत्री के रूप में पहली पसंद हो लेकिन ग्रामीण इलाके में कुंडली जमाये उनके टोलेबाज़ कहीं रंग में भंग न जमा दे।