कितना दम है कांग्रेस के बग़ावतियों में ?

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सुधीर कुमार

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चूका है , ऐसे में ये बगावती सूर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक चिंता का सबब ज़रूर बन गया है। गौरतलब है कि  पार्टी के वरिष्ठ नेता  गुलाम नबी आजाद , आनंद शर्मा और कपिल सिब्बल जैसे दिग्गज कांग्रेसी जम्मू में जुटे और एक नया मोर्चा खोलने का संकेत दिया. महात्मा गांधी को समर्पित कार्यक्रम में जुटे इन नेताओं ने पार्टी हाइकमान पर कोई सीधी टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन यह बताने का प्रयास किया कि पार्टी को मजबूत किये बिना अब काम नहीं चलनेवाला.

 

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, हमें यह सच कबूल करने से गुरेज नहीं कि कांग्रेस कमजोर हो रही है. हम चाहते हैं कि देश के हर जिले में कांग्रेस मजबूत हो. गुलाम नबी आजाद को दोबारा राज्यसभा के लिए नामित नहीं किये जाने पर भी उन्होंने चिंता जतायी. वहीं, आजाद यह कहने से नहीं चूके कि वह राज्यसभा से रिटायर हुए हैं, राजनीति से नहीं. राज बब्बर ने कहा कि हमें लोग जी-23 कहते हैं, लेकिन मैं (महात्मा) गांधी-23 कहता हूं. कांग्रेस के इन असंतुष्ट नेताओं को ‘जी-23’ भी कहा जाता है. दरअसल, पिछले साल पार्टी में बदलाव की मांग को लेकर इन नेताओं ने पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी को पत्र भी लिखा थ।

आखिर कितना दम है , इन बग़ावतियों में ?

कपिल सिब्बल हो चाहे राज बब्बर ये कागजी नेता है , भूपेंदर सिंह हुड्डा की लोगो पर अच्छी पकड़ से इंकार नहीं किया जा सकता है , गुलाम नबी आज़ाद एक बड़े नेता है , उनकी एक राष्ट्रीय छवि है , वो देश में कांग्रेस का एक मुस्लिम चेहरा है ,वही अपने गृह राज्य जम्मू और कश्मीर में उनकी छवि एक धर्मनिरपेक्ष नेता की है , ऐसे में  असम जहाँ ३४ प्रतिशत मुस्लिम आबादी है वहां निश्चित तौर पर आज़ाद का ये अंदाज़ कांग्रेस का बेडा गर्क

कर सकती है।

आखिर बगावत की वजह क्या है ?

भलेही ही देश में लोकतंत्र हो लेकिन हमारे देश की दोनों मुख्य राष्ट्रीय पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव ही है , शीर्ष नेतृत्व अक्सर अपना निर्णय राज्य नेतृत्व पर थोपती रही है , इतिहास गवाह है की ये तब तक ही चलता है जब शीर्ष नेतृत्व इंदिरा या मोदी जैसे चमत्कारिक चेहरे के हाथों में हो नहीं तो इसके विनाशक परिणाम हो सकते है , जिसका जनता दल में लालू प्रसाद का विद्रोह उदहारण है।

भूपेंद्र  सिंह हूडा के पर कतरने के इरादे से रणदीप सुरजेवाला को उतारा गया लेकिन वो हरियाणा चुनाव में एम् एल ए भी नहीं बन पाए , इसके बावजूद वो शीर्ष नेतृत्व के आंखों का तारा बने हुए है , वहीं शैलेजा को अध्यक्ष पद देने के बाद भूपेंद्र सिंह हुडा भी नाराज़ चल रहे हैं। अब सवाल ये है कि  क्या कांग्रेस इन दिग्गजों का विद्रोह झेल पाएगी , निश्चित तौर पर अगर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस केरल और असम में चुनाव जीत जाती है तो ये विद्रोह की चिंगारी  धुएं में बदल जायगी , नहीं तो ये एक मशाल का रूप लेकर कांग्रेस  पार्टी को नुक़सान पंहुचा सकती है।