सरना धर्मकोड : अगर कोड नहीं मिला तो इंट से इंच बजा देंगे, धर्म कोड नहीं तो वोट नहीं

भारत राजनीति

डेस्क : सरना धर्मकोड को लेकर आदिवासी संगठन ने रैली निकाली। कहा कि धर्म कोड नहीं तो वोट नहीं, अगर कोड नहीं मिला तो इंट से इंच बजा देंगे। कोरोना काल जहां सबकुछ ठप हो चुका हो, ऐसे में संघर्षों की आवाज का भी दब जाना स्वाभाविक सा लगता है लेकिन नहीं, संघर्ष की आवाज कभी नहीं दब सकती और इसका प्रमाण रांची में आदिवासी संगठनों के द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए रैली निकालना, इस बात की पुष्टि करती है।

अगर संकल्प मजबूत हो तो बड़ी से बड़ी रैली भी सफल हो सकती है। इसी संकल्प के साथ आदिवासी संगठनों ने कोरोना काल में इसकी मिसाल पेश की है। दरअसल, आदिवासी संगठनों ने 2021 में होने वाली जनगणना के फॉर्म में सरना कॉलम की मांग को लेकर रैली निकाली और मानव शृंखला बनाई थी।

रैली में कोरोना के सभी नियमों का बखूबी से पालन किया गया। कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए सभी लोगों के चेहरों पर मास्क थे और दो गज की दूरी भी थी। न कोई हो-हंगामा और न ही सड़क जाम, बिल्कुल शांतिपूर्वक प्रदर्शन।

दिवासी सेना के अध्यक्ष शिवा कच्छप ने कहा कि पानी अब सिर के पार जा चुका है। झारखंड के बाहर हमारी पहचान ईसाई या हिंदू के रूप में होती है। मगर वो लोग न तो ईसाई हैं और न ही हिंदू, वे लोग केवल प्रकृति पूजक है। अगर कोड नहीं मिला तो इंट से इंच बजा देंगे। शीतकालीन सत्र में विधानसभा घेरेंगे वहीं खाना बनाएंगे और खायेंगे।

अभाआविप के महासचिव नारायण उरांव ने कहा कि अब बर्दाश्त के बाहर हो चुका है। आदिवासियों की अपनी पहचान जरूरी है। इसलिए धर्म कोड नहीं तो वोट नहीं। अब तक सारे राजनीतिक दलों ने आदिवासियों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया अब ऐसा नहीं होगा।

शिक्षाविद डॉक्टर करमा उरांव ने कहा कि हमारी पहचान प्रकृति है। हम प्रकृति में जीते हैं। आदिवासी न तो इसाई बनना चाहते हैं और न ही हिंदू, इसलिए उन्हें अलग धर्म कोड चाहिए। अभाआविप की प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि यह झारखंड सहित पूरे देश में निवास करने वाले 12 करोड़ आदिवासियो के अस्तित्व का सवाल है। हम धर्मांतरण नहीं चाहते हैं न हम हिंदू बनना चाहते और न ही इसाई। इसलिए सरकार आदिवासियों की अलग पहचान प्रदान करे नहीं तो आगामी दिनों से उलगुलान होगा।