बिहार ने कई मांझी दिए, एक ‘मांझी द माउंटेन मैन’ और दूसरा जिसे आप नहीं जानते हैं तो पढ़िए

किस्से गांव

फीचर डेस्क : बिहार में इच्छाशक्ति से ऊर्जावान मेहनतशील लोगों की कमी नहीं है। यह ऐसा प्रदेश है, जिसके जन-जन में एक अलौकिक ऊर्जा है जो सत्ता को भी झुकाने के काबिल है। आपने दसरथ मांझी के बारे में तो सुना ही होगा, वही जिन्हें माउंटेन मैन के नाम से भी जाना जाता था, जिन्होंने अकेले ही 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काट कर 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी सड़क बना डाली थी और इनपर बॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी थी, मांझी द माउंटेन मैन।

वहीं अब बिहार के गया से ही यह दूसरा मामला सामने आया है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि यदि व्यक्ति ठान ले तो वह अकेला भी बड़े से बड़ा काम कर सकता है। कुछ ऐसी ही कहानी गया जिले के कोठीलवा गांव के रहने वाले लौंगी मांझी की है। लौंगी मांझी के 20 साल के अकेले साहस ने अपने गांव के खेतों में सिंचाई हेतु पानी के लिए 5 किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली है।

लौंगी मांझी ने जब सूखे की मार के कारण गांव के युवाओं को बाहर जाते देखा तो उन्हें पीड़ा हुई और उन्होंने यह काम करने की ठानी। दरअसल, जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर कोठीलवा गांव की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां सिंचाई के लिए बारिश का पानी रुक नहीं पाता है। यह गांव, घने जंगल और पहाड़ों से घिरा हुआ है। इसे माओवादियों की शरणस्थली के रूप में भी जाना जाता है। गया में लोगों के लिए आजीविका का मुख्य साधन खेती और पशुपालन ही है। बारिश के दौरान पहाड़ियों पर रुका हुआ सारा पानी नदी में चला जाता था, जिसका कोई सीधा लाभ गांव को नहीं मिल पाता था।

गांव के किसानों को सालों से सिंचाई के लिए पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता था, फिर क्या था लौंगी मांझी ने कुदाल थामकर इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने की कसम खा ली। यह लौंगी मांझी के अथक परिश्रम का नतीजा ही है कि आज उनके गांव के पोखर में पानी पहुंच चुका है।

गांव के प्रधान विष्णुपत भोक्ता का कहना है कि अगस्त 2001 में लौंगी ने बागेठा सहवासी जंगल में स्थित एक प्राकृतिक जल स्रोत से गांव तक एक नहर खोदने का फैसला किया। ग्रामीण आमतौर पर अपने मवेशियों को पानी पिलाने के लिए वहीं ले जाते थे। लिहाजा लौंगी जानता था कि इसका पानी स्रोत ग्रामीणों के खेतों में सिंचाई करने के लिए पर्याप्त था, लेकिन गांव तक इसका पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती थी।

लौंगी ने एक जमीनी सर्वेक्षण किया और नहर के लिए रास्ते को चिह्न्ति किया। 20 साल तक लगातार काम करने के बाद आखिरकार लौंगी ने चार फीट चौड़ी और तीन फीट गहरी नहर खोद ली। दशरथ मांझी की तरह ही ग्रामीणों ने उन्हें भी ‘पागल’ कहा, क्योंकि वह खुदाई के लिए पारंपरिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे थे। पर अब उसके अथक प्रयासों को देखते हुए जिला प्रशासन भी मदद के लिए आगे आया है और प्रशासन ने इसका नाम लौंगी नहर दिया है।

तो देखा आपलोगों ने बिहार के दसरथ मांझी और लौंगी मांझी ने एक पंक्ति को चरितार्थ किया, जो है- पहले लोग आप पर हसेंगे और सफलता आने पर आपकी ही नक़ल करेंगे।