Sunday, November 28, 2021

अपराध में गिरफ्तारी प्रेस पर हमला नहीं है, मठाधीशों ने किया मीडिया का पतन

भारत राजनीति

इंद्र वशिष्ठ : अभिनेता सुशांत सिंह की मौत के मामले मेंं न्याय दिलाने के नाम पर महीनों अभियान चलाने वाले मीडिया ने महाराष्ट्र में मां-बेटे के आत्महत्या मामले  मेंं न्याय दिलाने के लिए कभी अभियान नहीं चलाया। रिपब्लिक चैनल के मदारी/ दरबारी पत्रकार अर्नब गोस्वामी को पुलिस गिरफ्तार नहीं करती तो लोगों को यह कभी पता भी नहीं चलता कि मां-बेटे ने अपनी मौत के लिए मदारी की तरह चीख चीख कर दूसरों पर आरोप लगाने वाले अर्नब गोस्वामी को जिम्मेदार ठहराया है।

असल मेंं जब भी किसी बडे़ चैनल/अखबार का कोई पत्रकार आपराधिक मामले में आरोपी होता है तो पूरा मीडिया मौसेरे भाई की तरह एकजुट होकर उस मामले की खबर को दबा देता है। यहीं नहीं अगर पुलिस, सीबीआई, ईडी कभी कोई कार्रवाई करती भी है तो उसे प्रेस की आजादी पर हमला बता कर हंगामा शुरू कर दिया जाता है।

मां -बेटे को आत्महत्या के लिए मजबूर किया?-

मई 2018 मेंं महाराष्ट्र के अलीबाग मेंं इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक(53) और उसकी मां कुमुद ने आत्महत्या की थी। पुलिस को मौके से आत्महत्या संंबंधी पत्र मिला था। जिसमें लिखा था कि अर्नब गोस्वामी ने 83 लाख रुपए,  नितेश सारदा ने 55 लाख रुपए और फिरोज शेख ने 4 करोड़ रुपए की उनकी बकाया रकम का भुगतान नहीं किया। जिससे वह आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। आत्महत्या के लिए मजबूर करने के लिए अर्नब गोस्वामी समेत तीनों को दोषी ठहराया गया।

अन्वय की पत्नी अक्षता ने मामला दर्ज कराया था लेकिन पुलिस ने यह कहकर मामला बंद कर दिया कि सबूत नहीं मिले। उल्लेखनीय है कि उस समय महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार थी और यह भी सच्चाई है कि पुलिस सत्ता के इशारे के बिना सत्ता के दरबारी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई करने की सोच भी नहीं सकती है।

बेटी ने लगाई गुहार-

अन्वय की बेटी अदन्या ने इस साल मई मेंं महाराष्ट्र के गृहमंत्री से इस मामले की दोबारा जांच कराने की मांग की। जिसके बाद पुलिस ने जांच की। पुलिस ने इस मामले मेंं फिरोज शेख और नितेश सारदा को गिरफ्तार करने के बाद अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार किया है।

पुलिस अफसर मिन्नत करते रहे-

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। जिसमें साफ दिखाई देता है कि दरवाजे पर मौजूद अर्नब पुलिस के साथ चलने की बजाए अपने घर के अंदर चला जाता है। कमरे में अर्नब सोफे पर बैठा हुआ है पुलिस अफसर बहुत ही सभ्य तरीक़े से अर्नब से कह रहे हैं कि आपको हमारे साथ चलना होगा। लेकिन अर्नब साथ चलने से इंकार कर देता है इसके बाद पुलिस उसे पकड़ कर साथ ले जाती। अर्नब पकड़ से छूटने की कोशिश कर रहा है। इस वीडियो में पुलिस द्वारा अर्नब से मारपीट तो दूर बदतमीज़ी से भी बात करने का कोई दृश्य नहीं है। अर्नब की पत्नी भी वीडियो बनाती हुई दिखाई दे रही है।

मदारी ने गिरफ्तारी को भी तमाशा बनाया-

मदारी की तरह चीख कर पत्रकारिता का तमाशा बनाने वाले अर्नब गोस्वामी ने अपनी गिरफ्तारी का भी तमाशा बना दिया। सच्चाई यह हैं कि पत्रकार होने के कारण अर्नब के साथ पुलिस ने जितना सभ्य व्यवहार किया वह हरेक आरोपी के साथ पुलिस नहीं करती है। अर्नब को भी कानून का सम्मान और न्याय व्यवस्था भरोसा करते हुए खुद ही पुलिस के साथ आराम से बिना तमाशा किए चले जाना चाहिए था।

परिवार को न्याय मिले-

महाराष्ट्र पुलिस या सरकार को दोष देने से पहले उस परिवार के बारे मेंं सोचना चाहिए जिसके दो सदस्यों ने अपनी जान देने के लिए अर्नब को जिम्मेदार ठहराया है। अन्वय की पत्नी ने मीडिया के सामने खुल कर अर्नब को मौतों के लिए जिम्मेदार ठहराया है। दूसरा आत्महत्या संबंधी पत्र भी दो साल पहले का है। वह कोई पुलिस ने अर्नब को फंसाने के लिए कोई अब खुद तो लिखा नही है।

पुलिस की साख दांव पर-

सच्चाई यह है कि केंद्र या राज्यों मेंं सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो सभी पुलिस को सत्ता के लठैत की तरह ही इस्तेमाल करते हैंं। पुलिस बेकसूरों को झूठे मामलों में फंसाने के लिए भी कुख्यात है। इसलिए पुलिस के दावों पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

महाराष्ट्र पुलिस ने अगर वाकई अब जांच ईमानदारी से की है तो सरकार को अपनी साख बचाने के लिए उन पुलिस वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए जिन्होंने दो साल पहले इस मामले मेंं ईमानदारी से जांच नहीं की थी।

अपराध का पत्रकारिता से क्या लेना देना-

यह सीधा सीधा भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दर्ज आत्महत्या के लिए मजबूर करने या उकसाने का आपराधिक मामला  है। इसका पत्रकारिता से भला क्या लेना देना ? इसी तरह  फर्जी टीआरपी का मामला भी आपराधिक मामला है। यह दोनों ही मामले किसी खबर से संबंधित नहीं है। इसलिए इसे प्रेस की आजादी पर हमला मानने वाले अपने दिमागी दिवालियापन का ही परिचय दे रहे हैं।

आम पत्रकारों के शोषण पर चुप संगठन –

आम पत्रकारों को नौकरी से निकालने या उनके शोषण के खिलाफ पत्रकारों के ऐसे संगठन चुप रहते हैं लेकिन जब भी किसी मठाधीश पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामले में कार्रवाई शुरू होती तो यह पत्रकार संगठन तुरंत उसे प्रेस की आजादी पर हमला करार दे देते हैं। पत्रकारों के संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए है इसलिए यह सिर्फ उस दल या उससे जुड़े पत्रकार के पक्ष मेंं ही हमेशा बोलते हैं।

पत्रकार कानून से ऊपर नहीं, जांच जल्दी हो-

आपराधिक मामले में यदि किसी पत्रकार का नाम आरोपी के रुप में आता है या पुलिस उसे गिरफ्तार करती है तो पत्रकार संगठनों को सिर्फ़ एक ही मांग सरकार से करनी चाहिए कि एक तय समय मेंं जल्द से जल्द मामले की निष्पक्ष जांच से यह साबित किया जाए कि पत्रकार पर लगाए आरोप सही है या नहीं। अगर पत्रकार अपराध मेंं शामिल नहीं पाया जाता तो उसे प्रताड़ित या गिरफ्तार करने वाले पुलिस अफसरों को जेल भेजा जाना चाहिए। लेकिन पत्रकार संगठन ऐसी कोई मांग सरकार से करने की बजाए खुद ही बिना किसी जांच के पत्रकार के बेकसूर होने का ऐलान तो करते ही है साथ ही उसे प्रेस की आजादी पर हमला करार दे देते हैं।

पत्रकारों के नुमाइंदे बन बैठे चंद मठाधीश-

देशभर में हजारों समाचार पत्र/ पत्रिका और सैकड़ों न्यूज चैनल हैं लेकिन एडिटर्स गिल्ड में सदस्य संपादकों की संख्या सैकड़ों मेंं ही हैं यानी हजारों संपादकों को गिल्ड ने सदस्य भी नहीं बनाया हुआ है। ऐसे मेंं यह गिल्ड देशभर के पत्रकारों/ संपादकों की नुमाइंदगी करने का दावा कैसे कर सकती है। यह संस्था आम पत्रकारों के शोषण या उन्हें फर्जी मामलों में फंसाने के मामलों पर चुप रहती है लेकिन दिल्ली मेंं मौजूद मठाधीश पत्रकारों के मामले में तो तुरन्त आवाज उठाती है।

मठाधीशों ने किया मीडिया का पतन-

जुंबा पर झूठ, दिल है काला-

साल 2017 मेंं  सीबीआई और ईडी ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए थे। सीबीआई ने प्रणव राय के खिलाफ 48 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था। उस समय प्रणय रॉय, कांग्रेस के दरबारी पत्रकारों ,उनके संगठनों और मोदी के विरोधी अरुण शौरी आदि ने भी उसे प्रेस की आजादी पर हमला बता कर मोदी पर हमला किया था।

अब भाजपा अपने दरबारी पत्रकार अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को प्रेस की आजादी पर हमला बता रही है। जबकि ये दोनों ही मामले किसी भी तरह से प्रेस की आजादी पर हमला नहीं है।

प्रणय रॉय खुद गोदी/ दरबारी-

एनडीटीवी के बारे में तो जगजाहिर है कि वह तो ब्यूरोक्रेट और कांग्रेस की गोदी में पला-बढ़ा है। प्रणय रॉय के खिलाफ तो 1998 में भी दूरदर्शन से जालसाजी धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ था, लेकिन कांग्रेस के संरक्षण के कारण प्रणय रॉय का कुछ नहीं बिगड़ा।

सीबीआई में रहे एक आईपीएस अफसर ने बताया कि  सरकार के दबाव के कारण सीबीआई ने प्रणय रॉय के खिलाफ केस  बंद करने के लिए  कोर्ट में कई बार रिपोर्ट दी। लेकिन इस मामले में इतने सबूत प्रणय आदि के खिलाफ थे कि जज ने हर बार सीबीआई की केस बंद करने की रिपोर्ट को नहीं माना और सीबीआई को सही तरीके से तफ्तीश करने को कहा था।

मोदी सरकार को इस मामले में कांग्रेस के समय में  क्या क्या हुआ और सीबीआई ने किसके इशारे पर यह केस रफा दफा किया  यह असलियत उजागर करनी चाहिए। यह भी बताना चाहिए सीबीआई में कुल कितने केस आज़ तक प्रणय रॉय के खिलाफ दर्ज हुए थे और उनमें क्या कार्रवाई हुई।

जुबां पर सच और दिल में इंडिया और सभी को गोदी पत्रकार कहने वाले कांग्रेस की गोद मेंं पले एनडीटीवी ने सरकारी जमीन कब्जाने वाले  पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार मिन्ना, जबरन वसूली के आरोपी सुभाष चन्द्र गोयल, सुधीर चौधरी, लंदन में अफसर की पोस्टिंग कराने का ठेका लेने वाले टाइम्स आफ इंडिया के संपादक दिवाकर और अरुण जेटली के बारे में या इंडिया टीवी के हेमंत शर्मा के बारे में भी अपनी पत्रकारिय प्रतिभा दिखाई होती तो पता चलता कि बाबू मोशाय प्रणय रॉय और ये सब आपस में मौसेरे भाई नहीं है।

वसूली संपादक-

जी न्यूज के सुधीर चौधरी को दिल्ली पुलिस ने नवीन जिंदल से जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। जी न्यूज का मालिक सुभाष चंद्र भी उस मामले में आरोपी था। यह वहीं सुधीर चौधरी है जिसने लाइव इंडिया चैनल मेंं झूठी खबर दिखाई कि सरकारी स्कूल की टीचर उमा खुराना छात्राओं से वेश्यावृत्ति कराती है। पुलिस ने भी बिना जांच के उमा खुराना को जेल भेज दिया।

जेल भेजने के बाद जांच की तो पता चला कि खबर झूठी थी। पुलिस ने उस समय सिर्फ़ रिपोर्टर को गिरफ्तार किया सुधीर चौधरी को छोड़ दिया था। सुधीर चौधरी को अगर उसी समय गिरफ्तार किया जाता तो वह उद्योगपति नवीन जिंदल से 100 करोड़ की वसूली का अपराध करने की हिम्मत नहीं करता। पत्रकारों के किसी संगठन या एडिटर्स गिल्ड ने कभी इन उपरोक्त मठाधीशों की निंदा तक नही की।

रजत शर्मा की अदालत –

अब बात रजत शर्मा की। मेडिकल कॉलेज में दाखिला करने की मंत्री से मंजूरी दिलाने के लिए दो करोड़ रिश्वत लेने वाले बाप बेटे को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इन्होंने किसी हेमंत शर्मा नामक दलाल के लिए  यह रकम ली थी। लेकिन सीबीआई ने उसे गिरफ्तार नहीं किया। इसके बाद रजत शर्मा ने  हेमंत शर्मा को चैनल से निकाल कर खुद को ईमानदार दिखाने की कोशिश की। हिंदुस्तान टाइम्स में रजत शर्मा ने कहा कि वह ग़लत काम  को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता।

इस तरह का हास्यास्पद बयान देने वाले रजत शर्मा अगर ईमानदार है तो अपने चैनल पर बताए कि भ्रष्टाचार के मामले के कारण उसे हटाया हैं और अपने मित्रों मोदी और अमित शाह से कहें कि इस मामले में हेमंत को न बख्शा जाए। प्रताड़ना का आरोप लगा कर ज़हर खाने वाली इंडिया टीवी की तनु शर्मा को इंसाफ दिलाने के लिए भी मठाधीशों ने ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌आवाज नहीं उठाई।

बेकसूर पत्रकार के लिए आवाज नहीं उठाते-

कश्मीर टाइम्स के पत्रकार इफ्तिखार गिलानी को 9 जून 2002 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल मेंं देश द्रोह के झूठे मामले में फंसा कर जेल मेंं डाल दिया था। अदालत मेंं सेना के अफसर की गवाही से ही पुलिस की झूठ की पोल खुल गई। पोल खुलने के बाद पुलिस ने गिलानी के खिलाफ मामला वापस लिया। गिलानी को सात महीने जेल मेंं नारकीय जीवन बिताना पड़ा। पत्रकारों के संगठन ने कभी यह मांग नहीं की गिलानी को मुआवजा दिया जाए और उसे झूठा फंसाने वाले अफसरों को जेल भेजा जाए।

अहमियत पत्रकार की हैसियत को  –

क्या कोई बता सकता है बलात्कारी राम रहीम का पर्दाफाश करने वाले सिरसा के पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के  हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर  दिल्ली के पत्रकारों के संगठनों ने कितने प्रर्दशन किए या उसके परिवार की कोई मदद की हो। किसी ने मोमबत्ती ड्रामा या मानव श्रृंखला बनाई हो या इसका तब फैशन नहीं था।

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असल में इनकी मोमबत्तियां भी मरने वाले की हैसियत और उस समय  के विपक्ष के इशारे पर ही जलती बुझती है। राज्यों में काम करने वाले ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌पत्रकारों को भी मालूम होना चाहिए कि दिल्ली में आवाज़ उसी की उठाई जाती है जो हैसियत वाला हो या जिसने नयोता/शिकायत दी  हो।