आखिर कांग्रेस कब अपने पैर पर चलना सीखेगी ?

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सुधीर कुमार
पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है और एक बार फिर कांग्रेस वैशाखी के सहारे इस वैतरणी को पार करने की आस लगा रखी है , चाहे बात असम की हो जहां वो अजमल के साथ लड़ रही है, वहीं बंगाल में पीरज़ादा की पार्टी आई एस एफ और वाम दल के कंधे पर सवार है ,जबकि तमिलनाडु में डीएम् के की बस में सीट मांग रही है।

आखिर कांग्रेस अपनी भूल से कब सीखेगी ?
मेरी नज़र में कांग्रेस की दुर्गति की शुरुआत तब हुए जब १९९६ में स्व श्री नरसिम्हा राव ने बी एस पी सुप्रीमो स्व कांशीराम से समझौता कर कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में बंटाधार कर दिया , जिसके बाद कांग्रेस का प्रदेश में ग्राफ गिरता ही गया , वहीं बात बिहार में हुई , जिस लालू ने कांग्रेस पार्टी को १९८९ में सत्ता से बेदखल किया उन्ही के साथ दस साल बाद सत्ता में शामिल हो गई , यही बात कर्नाटक में भी दोहराई गई।

भाजपा की हार से कब तक खुश होती रहेगी ?

पिछले कुछ सालों में कांग्रेस की ये नियती बन गयी है कि वो अपनी जीत से ज्यादा खुश भाजपा की हार पर होती है , ठीक वैसा ही जैसा अस्सी के दशक में जब भारत के क्रिकेट दर्शक अपनी जीत से ज्यादा पाकिस्तान की हार पर खुश होते थे , क्योंकि उन्हें अपनी टीम से जीत की उम्मीद ही नहीं थी।

आखिर कौन भरेगा कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जीत का जज़्बा ?

जब दस साल बाद डी एम् के , पंद्रह साल बाद बिहार में आर जे डी अपने बूते , दस साल बाद चंद्रबाबू नायडू अपनी मौजूदगी का अहसास दिला सकते हैं तो कोंग्रेस क्यों नहीं? इसके लिए ज़रूरी हैं की कांग्रेस अपने पार्ट टाइम नेताओं को पीछे कर ऐसे लोगों को आगे करे , जो रात दिन एक कर कांग्रेस का संगठन मजबूत करे।
कांग्रेस को इसकी शुरुआत तमिलनाडु से करनी चाहिए
करीब तीन दशक बाद ना करुणाकरण हैं और ना ही जी रामचंद्रन और जयललिता , ऐसे में कांग्रेस के पास एक मौका हैं की वो आने वाले चुनाव में अपने आप को एक मजबूत विपक्ष के रूप में प्रस्तुत करे ताकि २०२४ के लोक सभा चुनाव में वो तमिलनाडु में पंजा खोल सके।