आखिर बिहार कब तक रहेगा , बीमार प्रदेश ?

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सुधीर कुमार
जिस प्रदेश के इतिहास के बिना हिन्दुस्तान का इतिहास अधूरा है , आज उस प्रदेश की आधी आबादी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी की तलाश में डेरा डालने को मज़बूर है। नया उद्योग तो छोड़िये , वर्षों से उत्तर बिहार में चीनी मिलें बंद पड़ी है।
आखिर कौन है ज़िम्मेदार ?
सत्तर के दशक से ही प्रदेश, विकास की राह से भटक गया , कैलेंडर की तरह से प्रदेश में मुख़्यमंत्री बदलने लगे , हालाकिअस्सी के दशक समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस ने खासकर मुजफ्फरपुर को एक उद्योग नगरी के रूप में विकसित करने की कोशिश की , लेकिन उसी दौरान इलाके में अपराध बढ़ता गया , जिसकी वजह से कारोबारी शहर छोड़, पलायन को मज़बूर हो गए। नब्बे के दशक में लालू-राबड़ी की सरकार ने प्रदेश में राजनितिक स्थिरता तो दी , लेकिन पहले लालू यादव का कार्यकाल जातिवाद की भेंट चढ़ गया , बाद में राबड़ी सरकार बनी तो केंद्र से रार की वजह से बिहार विकास से वंचित ही रह गया।
नीतीश काल

निश्चित तौर पर नीतीश सरकार का २००५ से २०१० का कार्यकाल एक स्वर्णिम काल रहा , लेकिन वर्ष २०१० विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद नीतीश और भाजपा में आंतरिक कलह तेज हो गया , नीतीश प्रधानमंत्री का सपना देखने लगे इस दौरान फिर विकास की लौ टिमटिमाने लगी , हालांकि पिछले कुछ वर्षों में आधारभूत ढांचा पर काम हो रहा है , लेकिन वो नाकाफी है।
संसाधनों की कमी

झारखण्ड के अलग होने के बाद , उद्योग के साथ -साथ खनिज संपदा भी झारखण्ड के हिस्से में चली गई , आज प्रदेश सरकार के राजस्व की कमी है , इसलिए सरकार चाहकर भी विकास को रफ़्तार नहीं दे पा रही है।

कारोबारी माहौल का आभाव
अभी भी बिहार में अपना कारोबार करना गर्व की जगह मजबूरी की बात है। जब कही नौकरी नहीं मिलती है तब ही लोग अपना कारोबार करते है ,इसके लिए राज्य में कानून व्यवस्था की बदतर हालत भी ज़िम्मेदार है। जाति की दीवार इतनी ऊँची हो गई है की लोग उसी में उलझ गए है।