बिहार में महिलाओं को है सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवा की जरूरत

बिहार भारत स्वास्थ्य

बिहार में, खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए उचित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच हमेशा से एक चिंता का विषय रहा है। हालांकि पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं की पहुंच की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर हुई है। फिर भी देखभाल की गुणवत्ता, विशेष रूप से गरिमापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के बारे में संवाद का स्तर लगभग शून्य है, अर्थात इस विषय पर आज भी न के बराबर बात होती है। महिलाओं और युवा लड़कियों के साथ अक्सर असम्मानजनक व्यवहार किया जाता है। उनके बारे में पूर्वाग्रहित धारणाएं बनायी जाती हैं। जब वे स्वास्थ्य केंद्रों पर जाती हैं, तो भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। इन सेवाओं को हासिल करते हुए महिलाओं तथा युवतियों को अक्सर एक विशेष पूर्वानुमान या फिर अपमान से गुजरना पड़ता है। कई बार उन्हें सही सलाह भी नहीं मिलती है। इसकी वजह से न केवल उन्हें गलत जानकारी मिलती है, बल्कि उनके बीच एक असुरक्षित माहौल भी तैयार होता है। परिणामस्वरूप, कई स्त्रियॉं को सही इलाज और समुचित देखभाल से वंचित रह जाती है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार परिवार नियोजन के वर्तमान लाभुकों में 46.5 % को ही परिवार नियोजन के तरीकों से होने वाले किसी भी तरह के दुष्प्रभाव के विषय में जागरूक किया गया था। 

क्या है “खुद से पूछें”अभियान?

“खुद से पूछें” महिलाओं के नेतृत्व में शुरू किया गया एक जनहित अभियान है, जिसका उद्देश्य बिहार में महिलाओं को ‘गरिमा के साथ देखभाल’ की असली परिभाषाओं से अवगत करवाना और इसे अपने स्तर पर बेहतर समझना है. साथ ही सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवा के बारे में उनकी कहानियों और अनुभवों को आवाज देना है। ’ख़ुद से पूछें’ एक सहभागी अभियान है, जिसके माध्यम से महिलाएं खुलकर बात करना, अपनी समस्याओं को समझना और स्वास्थ्य संबंधी कमियों को जान पायेंगी।

 

महिला स्वास्थ्य के मुद्दे पर महिलाओं को ही बनाया गया है एंबेस्डर

’ख़ुद से पूछें’ अभियान में पूरे बिहार की 18-30 आयु वर्ग की महिलाओं को व्हाट्सएप मैसेज भेजकर कार्यक्रम में आवेदन करने के लिए और एम्बेसडर बनने के लिए आमंत्रित किया गया। इच्छुक महिलाओं से ऑनलाइन फॉर्म भरवाया गया। इसके बाद महिलाओं के एक समूह का चयन किया गया। चयनित महिलाओं को उनकी नेतृत्व संरचना तथा कहानी कहने के उनके कौशल का निर्माण करने वाली कई कार्यशालाओं में आमंत्रित किया गया। चुनी गयीं महिला एम्बेसडर फिलहाल सम्मानजनक ‘स्वास्थ्य देखभाल सेवा’ हासिल करने की दिशा में बातों की शुरुआत करके सकारात्मक बदलाव लाने के लिए शुरू किये गये इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रही हैं और अन्य महिलाओं को गरिमापूर्ण स्वास्थय सेवाऐं हासिल करने के अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाने में मदद कर रही हैं।

इस अभियान के अंतर्गत पूरे पटना में रोड शो, संवाद, नुक्कड़ नाटक, वर्कशॉप आदि आयोजित किये गये, जिसमें नेशनल स्कूल ड्रामा के कलाकारों की भागीदारी भी शामिल रही।

10 सितंबर, 2021 को पटना वुमेंस कॉलेज में पहला वर्कशॉप आयोजित किया गया।  उसके बाद 11 सितंबर, 2021 को पटना के श्री साईं कॉलेज ऑफ नर्सिंग एंड मेडिकल में दूसरा तथा 18 सितंबर 2021 को अरविंद महिला कॉलेज की छात्राओं के साथ तीसरा वर्कशॉप आयोजित किया गया।

पटना कॉलेज की छात्रा मिताली प्रसाद ने अपने साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए, यह सुझाव दिया कि डॉक्टर को मरीज के साथ सही से पेश आना चाहिए। साथ ही मरीज को भी डॉक्टर के साथ सही से व्यवहार करना चाहिए। मिताली ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य संबंधित सेवाओं के दौरान मरीजों से गलत व्यवहार, गलत इलाज का सुझाव और अधिक पैसे नहीं वसूलने चाहिए। साईं कॉलेज ऑफ नर्सिंग एंड पर मेडिकल की मानवी का कहना था कि जो मरीज़ अच्छे कपड़े में आता है, जिसके पास ज्यादा पैसा होता है, डॉक्टर उसे अच्छे से बर्ताव करते हैं, मगर जो गरीब होते हैं, उनके साथ न तो डॉक्टर ठीक से पेश आते हैं और न ही सही से बर्ताव करते हैं। कपड़े और पैसे के अभाव में डॉक्टरों द्वारा किसी के स्वास्थ्य की देखभाल को नजरअंदाज करना कहीं से भी सही नहीं है।

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‘गरिमा एक्सप्रेस’ रोड शो – पांच दिन, 20 जगह, 10 हज़ार महिलाऐं

इस अभियान में पांच दिन के रोड शो का आयोजन भी किया गया, जिसमें शामिल ऑड इवेन ‘गरिमा एक्सप्रेस’ पटना वुमेंस कॉलेज, बोरिंग रोड, पटना यूनिवर्सिटी, गांधी मैदान, हथुआ मार्केट, पटना मार्केट और फ्रेजर रोड समेत बीस अलग-अलग जगहों से गुजरी और दस हज़ार से ज़्यादा महिलाओं से जुड़ीं। रोड शो में कई महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किये और हर व्यक्ति को भागीदार करने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि दर्शकों का ध्यान स्वास्थ्य सेवा में सम्मान की आवश्यकता और उपयोगिता की ओर खिंचे।

कई संगठनों की रही सम्मिलित भागादारी

महिलाओं के नेतृत्व में सामूहिक अभियान के रूप में विकसित किए गए, ‘खुद से पूछें’  अभियान की अगुआई सखी, गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच और पटना स्थित युवा समूह अशोक यंग चेंजमेकर द्वारा की जा रही है। इस अभियान को अन्य संगठनों जैसे बिहार्ट, सेंटर फॉर कैटलाइसिंग चेंज, पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, कॉलेजों और अन्य समूहों से भी समर्थन मिल रहा है।

बिहार के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की स्थिति

बिहार में ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य के दिशा में पिछले दो दशक में काफी काम हुए हैं और ग्रामीण महिलाओं की स्वास्थय सेवाओं तक पहुंच को बढ़ावा मिला है, लेकिन अभी भी स्वास्थ्य सेवा में आने वाली समस्या बनी हुई है। जैसे जातिगत भेदभाव, गरीबी या जानकारी कम होना आदि। अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं के साथ होनेवाले व्यवहार बहुत डरावने हैं। सर्वाधिक महिलाओं ने बताया की प्रसव के समय उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया गया।

कई विवाहित महिलाओं ने अपनी आपबीती में इस बात का ज़िक्र किया कि अगर उनकी महावारी किसी भी कारणवश रुक जाती है, तो बिना वजह जाने यह सोच लिया जाता है कि वो महिला गर्भवती ही होगी, इस बाबत इलाज शुरू कर दिया जाता है, जबकि बाद में कई तरह की गंभीर बीमारी सामने आती हैं, जिसके परिणाम और भी गंभीर हो जाते हैं। ग्रामीण महिलाओं को खास तौर से प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य की समस्याओं में सबसे अधिक आत्मग्लानि महसूस कराई जाती है।

 

‘ख़ुद से पूछें’ कार्यशालाओं में महिलाऐं अपने अनुभव साझा करते समय यह बताती हैं कि महिलाओं को बचपन से ‘आदर्शवादिता’ की आड़ में लज्जा, भय, झिझक, संकोच, त्याग आदि की शिक्षा दी जाती है. इसी वजह से वे इस तरह की क्रूरता को सहन भी करती रहती है और लज्जावश किसी को बता नहीं पातीं। महिलाओं का कहना है कि प्रशासन और समाज की ज़िम्मेदारी है कि महिलाओं के साथ हो रहे इन व्यवहारों के विरुद्ध आवाज बने एवं स्वास्थ्य सेवा प्रदाता एवं इससे जुड़े संस्थाओं को प्रशिक्षित बनाएं और संवेदनशील बनाये।

बेहद चौंकानेवाली है महिलाओं की आपबीती

महिलाओं के नेतृत्व में सामूहिक अभियान के रूप में विकसित किए गए, ‘ख़ुद से पूछें‘अभियान में कई संस्थाओं की सम्मिलित भागीदारी शामिल रही- इनमें सखी, बिहार यूथ फॉर चाइल्ड राइट्स, गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच और पटना स्थित युवा समूह अशोक यंग चेंजमेकर प्रमुख हैं। इनके अलावा, पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया, सेंटर फॉर सोशल इक्वलिटी एंड इन्क्लूज़न, कॉलेजों और अन्य समूहों से भी इस अभियान को भरपूर समर्थन मिल रहा है। इस अभियान से जुड़नेवाली महिलाओं ने जब अपनी आपबीती सुनायी, तो अभियान से जुड़े सभी गणमान्य लोग सोचने पर मजबूर हो गये।

स्नातक की छात्रा पिंकी कुमारी कहती है कि इस तरह के कार्यक्रम से महिलाओं एवं लड़कियों के मन से डर खत्म होगा और वे बेझिझक होर डॉक्टर के पास जा सकेंगी और अपने साथ होनेवाले व्यवहार के बारे में मुखरता से बोल पाएंगी। माहवारी एवं उससे जुडी समस्या के साथ-साथ स्तन कैंसर के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन हम आये दिन अपने आसपास कई ऐसे मामले देखने-सुनने को मिलते हैं, जहां महिलाएं पहले शर्म के कारण किसी को नहीं बताती है और बाद में बहुत देर हो जाती है।

बिना मां के जूझना पड़ा माहवारी से

बिन मां की बच्ची आरती कुमारी कहती हैं कि मां के नहीं होने से महावारी जैसी समस्या के अनुभवी से खुद जूझती रही। दोस्तों की मदद से इधर-उधर से इलाज करवाती रही, जिस कारण लम्बे समय तक मुझे प्रजनन तन्त्र की परेशानियों से जूझना पड़ा, लेकिन डर और शर्म से मैं किसी को कुछ बता नहीं पा रही थी। ‘ख़ुद से पूछें‘ अभियान से मुझे यह सब कहने का मौका दिया, इसिलए मैं इसकी एम्बेसडर बन गयी, ताकि अपनी आपबीती बता कर लोगों को यह समझा सकूं कि वे अपने स्वास्थ्य को इग्नोर न करें। खुद की देखभाल पहले करें। बिना किसी शर्म के डॉक्टर के पास जाएँ और उन्हें पूरी जानकारी देकर बेहतर इलाज करवाएं।

 

पम्मी कुमारी ने ‘ख़ुद से पूछें‘ कार्यक्रम का एम्बेस्डर बनना, इसलिए चुना क्योंकि डॉक्टर के व्यवहार से इन्हें जीवन में काफी परेशानी झेलनी पड़ी। डॉक्टर की गलती से प्रसव के समय इनका गर्भाशय कई टुकड़ों फट गया था । वह दिन याद करने पर पम्मी काफी अक्रोशित हो जाती है। पम्मी चाहती है डॉक्टर एवं नर्स को मरीजों के साथ व्यवहार करने की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।

डॉक्टर भी गलत नजर से देखता है

पुनपुन निवासी मिक्की कुमारी बताती है कि अगर डॉक्टर से खुलकर बात करते हैं और उसे अपनी समस्या बताते हैं, तब वह भी कई बार हमें गलत नजर से देखता है। इसी कारण कई महिलाऐं खुलकर नहीं बोल पातीं। जब हम खुलकर बोलते हैं, तब हमें ‘बुरी औरत‘ कह दिया जाता है, इसलिए इस कार्यक्रम के माध्यम से यह कहना चाहती हूं कि यदि किसी के कुछ कहने के डर से आप अपनी समस्या अपने पास रखते हैं, उसका सही इलाज नहीं करवाते हैं, तब एक दिन वही समस्या लाइलाज हो जाती है। सभी लोगों खुद से पूछना चाहिए कि हमारे साथ क्या हो रहा है। हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति हमेशा मुखर रहना चाहिए।

वहीं जुली कुमारी कहती हैं सरकार के व्यवस्था में सुधार होने से महिलाओं की यह समस्या का समाधान हो सकता है। अगर डॉक्टर अच्छा व्यवहार करते है या देखभाल अच्छा हो तो सभी महिलाऐं अपनी बात उससे कह पाएंगी। प्रसव के समय महिलाओं के साथ होनेवाले व्यवहार के बारे में अगर गंभीरता से विचार किया जाये, जो औरतें बच्चा करना हीं नहीं चाहेगी।

खुद से पूछें’ अभियान के तहत निम्नतर प्रखंडों की महिलाओं को एम्बेसडर बनाया गया और उन्हें ऑनलाइन प्रशिक्षण दिया गया। महिलाओं को मीटिंग से जुड़ना, अपना फेसबुक अकाउंट बनाना तथा उसे चलाना भी सिखाया गया। व्हाट्सप्प पर हिंदी में लिखना सिखाया गया तथा गूगल सर्वे फोर्मेट का यूज करना सिखलाया गया, ताकि वे अपनी कहानियों को अपने समूह में साझा कर सकें और असम्मानजनक व्यवहार के प्रति आवाज़ उठा सकें.

गुडगाँव की मशहूर विजुअल आर्टिस्ट ’प्रिंसेस पी’ भी जुड़ी हैं इस अभियान से

गुडगाँव की मशहूर विजुअल आर्टिस्ट ’प्रिंसेस पी’ भी इस अभियान की एम्बेसडर के तौर पर प्रतिनिधित्व कर रही थीं। मटर के रूपरंग वाले वेशभूषा के लिए नामचीन प्रिंसेस पी बिना अपनी असल पहचान ज़ाहिर किए हुए लगातार औरतों के मुद्दे पर काम करती आ रही हैं। उन्होंने अब तक कई कार्यशालाएँ आयोजित की हैं जिसमें वेभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं से संवाद करते हुए देखभाल से जुड़ी हुई राजनीति और स्त्रियों की घर-परिवार-बच्चे से जुड़ी हुई आर्थिक व्यथा-कथा को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश की है।

इस अभियान में प्रिंसेस पी महिलाओं के साथ मिलकर, व्यक्तिगत कहानियों और रचनात्मक अभिव्यक्ति द्वारा समर्थित एक प्रतीक को कपड़े कढ़ाई और पैचवर्क के द्वारा बनाने की अगुवाई कर रही हैं, जिसे अक्टूबर में पटना शहर में एक विशेष जगह पर आर्ट-इन्स्टालेशन के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।

वह कहती हैं, “मैंने अधिकतर घरेलू महिलाओं, लघु व्यवसायियों, विकलांग स्त्रियों, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं, वे स्त्रियाँ जिन्हें अपने रूपरंग के लिए सताया गया हो, और मानसिक परेशानियों से जूझ रही औरतों साथ नज़र आने और उनके ग़ायब हो जाने के पैटर्न पर काम किया है। यह एक ख़ास मौक़ा है जब आवश्यक दख़ल को मज़बूती और गरिमा का प्रतीक बनाया जा सकता है।

उम्मीद है एक सकारात्मक पहल की

’खुद से पूछें’ अभियान महिलाओं को संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा की जरूरतों को समझने और उसके लिए स्पष्ट आवाज़ उठाने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है। इसका मकसद है महिलाओं को बदलाव लाने की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाना, जैसे सबसे पहले मुद्दे को समझना, उस पर चर्चा करना और फिर हरसंभव माध्यम से पहल करना।

’खुद से पूछें’ अभियान में महिलाओं को ऐसे विभिन्न मुद्दों पर विशेषज्ञों के साथ बातचीत करने का मौका मिल रहा है, जिन मुद्दों का उनके जीवन पर प्रभाव पड़ता है। साथ ही विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा पटना की महिलाएं डिजिटल क़िस्सागोई के गुर सीख रही हैं, ताकि वे स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में अपनी बात कह सकें। साथ ही इस का प्रसार सोशल मीडिया, सार्वजनिक कार्यक्रमों अथवा किसी अन्य स्त्री से बात करते हुए कर सकें।