रचना प्रियदर्शिनी : केस एक, 2 दिसंबर, 2018 : केरल के सबरीमाला मंदिर की ही तरह हरियाणा के गांव में स्थित भगवान कार्तिकेय के मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करनेवाली महिलाएं अगले सात जन्मों तक विधवा रहेंगी.

केस दो, 28 नंबवर, 2018

उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले के रौतगढ़ा गांव में लड़कियों को महीने के पांच दिनों तक स्कूल नहीं जाने दिया जाता, क्योंकि स्कूल जाने के रास्ते में चामू देवता का मंदिर पड़ता है और स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अगर उस दौरान ये लड़कियां उधर से गुजरीं, तो मंदिर अपवित्र हो जायेगा. इसी वजह से कई माता-पिता ने अपनी बच्चियों को अच्छी शिक्षा के लिए पास के शहरों और कस्बों में अपने रिश्तेदारों के पास रहने के लिए भेज दिया है.

केस तीन, 22 नंबवर, 2018

तमिलनाडु के तंजावुर जिले में माहवारी कुप्रथा के चलते एक 14 वर्षीया बच्ची की जान चली गयी. हुआ यूं कि हालिया गाजा चक्रवाती तूफान में एक नारियल का पेड़ बच्ची के ऊपर गिर गया और वह गंभीर रूप से घायल हो गयी. इसके बावजूद  किसी ने उस बच्ची को अस्पताल तक नहीं पहुंचाया, क्योंकि उनके अनुसार वह अशुद्ध थी. ऐसे में पूरी रात दर्द से तड़पते हुए आखिरकार उसने दम तोड़ दिया.

हद हो गयी भई….. एक तरफ दुनिया मंगल, बृहस्पति, चंद्रमा और भी न जाने कितने ग्रहों उपग्रहों तक पहुंच चुकी है, दुनिया के विकसित देशों की पंक्ति में खड़े होने के लिए आप लगातार होड़ मचा रहे हैं, खुद को मॉर्डन और ओपन-माइंडेड कहते आपके जुबान नहीं थकते और दूसरी ओर, इस माहवारी/पीरियड/मासिक/मेंस से संबंधित फालतू के नियम-धर्म औ पोंगापंथी से आपका पीछा नहीं छूट पा रहा.

आखिर कितना और कब तक परेशान करोगे इस प्राकृतिक प्रकिया की आड़ में  अपनी मासूम बच्चियों को? अगर आपको लगता है कि माहवारी भगवान द्वारा महिलाओं को दिया कोई अभिशाप है, तो जान लीजिए कि आप (पुरुष) और पूरी दुनिया उसी अभिशाप का फल है इस लिहाज से आप भी अभिशप्त हुए. फिर तो आप पर भी वे सारी पाबंदियां लागू होती हैं, जो लड़कियों पर थोपी जाती हैं, लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगे, तो फिर लड़कियों के साथ ऐसी जबर्दस्ती क्यों?

जानिए क्या है माहवारी?

महिलाओं के शरीर में चक्रीय (साइक्लिकल) हार्मोस में होने वाले बदलावों की वज़ह से गर्भाशय से नियमित तौर पर ख़ून और अंदरुनी हिस्से से  स्राव होना मासिकधर्म (अथवा माहवारी) कहलाता है. यह कए स्वाभाविक जैविकीय प्रक्रिया है, जो कि 10-12 उम्र से शुरू होकर 45-50 साल तक चलती है.

जब कोई लड़की पैदा होती है, तो उसके अण्‍डाशयों में पहले से लाखों अपरिपक्‍व अण्‍डाणु मौजूद होते हैं. किशोरावस्था की दहलीज पर पहुंचते ही प्रत्येक 21 से 28 दिनों में उनमें से कई अंडे एक बार हार्मोनल स्टिमुलेशन की वजह से विकसित होने शुरू हो जाते हैं. आमतौर पर, प्रत्‍येक चक्र के दौरान अंडाशय में केवल एक ही अंडा परिपक्‍व होता है और गर्भाशय में छोड़ा जाता है, जिसे अण्‍डोत्‍सर्ग कहा जाता हैं.

इस दौरान, गर्भावस्‍था की तैयारी में गर्भाशय का भीतरी हिस्सा मोटा होना शुरू हो जाता है. इस अवधि में यदि यह अंडाणु निषेचित नहीं होता, तो यह गर्भाशय के भीतरी हिस्से के अतिरिक्‍त ऊतकों के साथ माहवारी ख़ून के रूप में योनि से निकलना शुरू हो जाता है और इसके बाद अगला माहवारी चक्र फिर से शुरू हो जाता है. बस इतनी सी बात है!

स्त्री देह के स्वस्थ होने का प्रतीक है माहवारी

जैसा कि मैंने पूर्व में कहा महावारी पूर्ण रूप से एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके घटित होने से ही इस धरती पर जीवन का अस्तित्व कायम है. अगर यह प्रक्रिया न हो, तो इस धरती पर मनुष्यों का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा. अत: माहवारी कोई बीमारी नहीं, बल्कि स्त्री देह के स्वस्थ होने का प्रतीक है,अन्यथा कई तरह के कॉम्प्लिकेशंस हो सकते हैं. यह स्राव न तो ‘अशुद्ध’ होता है और न ही अनहाइजीनिक !

फिर भी न जानें क्यों इस समाज में माहवारी को ‘महामारी’ बना कर रख दिया है. इस दौरान लड़कियों पर तमाम तरह की बंदिशें थोपी जाती हैं- पूजा मत करो वरना भगवान अपवित्र हो जायेंगे; तुलसी का पौधा मत छुओ, वह मुरझा जायेगा; अचार मत छुओ, ख़राब हो जायेगा; फलां दिन बाल धो, अपशकुन हो जायेगा.

माहवारी वाला सबके सामने मत फैलाओ, पुरुषों की नजर पड़ जायेगी वगैरह-वगैरह. कई बार तो धार्मिक कर्मकांडों में शामिल होने के लिए कुछ महिलाएं दवा के द्वारा माहवारी को थोड़ा आगे खिसका देती हैं, जो कि स्वास्थ की दृष्टि से बेहद घातक है.

हालांकि आसाम, केरल, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों के कुछ समाजों में पहली माहवारी पर रजस्वला लड़कियों को पूजा की जाती है. वहां इस प्रक्रिया को शुभ माना जाता है. फिर अधिकांश तथाकथित ‘सभ्य’ समाज के लिए आज भी  माहवारी के साथ शर्म, कल्चर ऑफ़ साइलेंस, अपशकुन, अपवित्रता, अशुद्धता जैसे अंधविश्वास और मिथक जुड़े हैं.

स्वास्थ्य के साथ-साथ मानवाधिकार का मामला भी है माहवारी

माहवारी केवल स्वास्थ्य से जुड़ा मसला ही नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार का भी मामला है, क्योंकि इसके साथ साथ जुड़ी भ्रांतियां, अंधविश्वास, तिरस्कार, भेदभाव इत्यादि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सम्मान के ख़िलाफ़ हैं. इसकी वजह से अक्सर समाज द्वारा महिलाओं की ‘मोबिलिटी’ को अवरूद्ध कर दिया जाता है.

संविधान की धारा- 21 किसी भी व्यक्ति को जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करती है, लेकिन माहवारी के दौरान सामाजिक और धार्मिक पाबंदियों की आड़ में समाज द्वारा महिलाओं के इस अधिकार का हनन किया जाता है. किशोरावस्था व प्रौढावस्था में मासिक स्राव के कारण क़रीब 60% महिलाओं को दर्द हो सकता है, लेकिन इससे जुड़ा शर्म, तिरस्कार, अपवित्रता कि सोच इसे स्त्रियों के ऊपर अत्याचार में बदल देता है.

इसका परिणाम यह होता है कि महिलाएं खुद को कमजोर मानने लगती हैं. माहवारी को लेकर उनमें शर्म, झिझक और असहजता का भाव पैदा हो जाता है, जो कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता रहता है. इसी वजह से वह घर में अपने पिता या भाई से इस बारे में बात तक नहीं कर पातीं. वे मेडिकल स्टोर से सेनेटरी पैड खरीदने में झिझकती है.

ग्रामीण इलाकों में तो आज भी बहुत-सी लड़कियां/महिलायें सेनेटरी पैड का इस्तेमाल ही नहीं करतीं. ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के स्कूलों से ड्रापआउट के कारणों में माहवारी को छुपाने तथा इससे जुडी स्वास्थ्य सुविधायें या अलग टॉयलेट न होना भी एक बड़ा कारण है. महिला शिक्षकों या कर्मचारियों को  इसके कारण कई बार असहज अथवा शर्मिंदा होना पड़ता है.

जरूरत है संवेदनशील नजरिया अपनाने की

माहवारी जैसी प्राकृतिक प्रकिया के कारण अगर स्त्री को समाज में सिमटकर चलना पड़े, शर्मिंदगी उठानी पड़े, या असहज होना पड़े तो यह किसी भी समाज के लिए शर्म की बात है. जो प्रकिया संपूर्ण मानव जाति के सृजन का आधार है, वह कतई अपवित्र या अशुद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि सृजनात्मकता कभी बुरा नहीं होती.

बुरा होता है विध्वंस ! फिर चाहे वह धर्म या जाति के नाम पर हो या फिर लिंग, कुरीति और अंधविश्वास के नाम पर हो. भारतीय समाज को यह सोच बदलनी होगी. माहवारी के प्रति संवेदनशील नजरिया अपनाना होगा, ताकि लड़कियां/महिलाएं अपने जीवन के इन विशेष दिनों को भी खुल कर जी सकें.

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